ये नया भारत है जहां बोलना मना है: अगर बोलेंगे तो UAPA, NSA और Sedition के तहत आप जाएंगे जेल
शुरुआत करते हैं सबसे नए और सबसे खतरनाक आलोकिक शक्ती से जिससे बहुत से लोगो की मन की बात की जा रही है जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ ‘UAPA’ जिसका पूरा नाम है ‘Unlawful activities prevention act’
इस कानून को 1967 में बनाया गया था जिसका मकसद था देश की अखंडता बनाए रखना फिर इसमें लगातार अमेंडमेंट होते आए हैं ये कानून समय के साथ बदलता गया

लेकिन जुलाई 2019 में एक अमेंडमेंट इसमें किया जिससे सरकार को ये पावर मिला की वो बिना किसी ट्रायल के किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित कर सकती है कोई ट्रायल नहीं,कोई मीडिया ट्रायल भी नहीं किसी को भी उठाकर उसपर UAPA लगाकर आतंकवादी घोषित कर सकती है

यहां तक के जिस बन्दे पर ये चार्ज लगाया गया हो उसको खुद पता नही होता कि उसका गुनाह क्या है
बस सीधा जेल में डाल दिया जाता है UAPA को सरकार ने 2019 में पूरा बदल डाला जिसके बाद सरकार ने एक के बाद एक एक्टिविस्ट पर UAPA थोपकर जेल में डाल दिया गया जिनमे से उदाहरण के तौर पर ये हैं- वाराबरा राओ, शरजील इमाम, आनंद तेलतुंबड़े। सरकार इसमे भी कोई कसर नहीं छोड़ती की जिस ओर UAPA लगाया गया है उसकी उम्र कितनी है बस उसको इस एक्ट के तहत जेल में डालना है ।

लेकिन ध्यान देने योग्य बात ये है कि जो हक़ीक़त मैं आतंकवादी हैं उन पर हमारी सरकार UAPA नहीं लगाती उदहारण के लिए आप देविंदर सिंह को ही ले लीजिए, UAPA तो छोड़िए उस खतरनाक आतंकवादी को बाद में बेल भी मिल गयी।
परेशानी ये नहीं कि इस कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है परेशानी ये है कि इस कानून का इस्तेमाल उन लोगो के खिलाफ किया जा रहा है जो सरकार की आलोचना करते हैं,जो एक पार्टी विशेष से आते हैं या जो एक खास सामुदाय से आते हैं।

आपको बता दें कि एक तिहाई ऐसे UAPA के केसेस होते हैं कि जिससे ये सिद्ध हो जाता है कि जिस व्यक्ति पर UAPA लगाया गया है वो असल में गुनहगार है या नहीं बहुत सारे केसेज़ में तो ये होता है जिसमे कोर्ट को बोल दिया जाता है कि गलती हो गयी है छोड़ दीजिए इनको अब आप बोलेंगे की बड़े-बड़े नेता बोल देते हैं कि नाथूराम गोडसे देशभक्त है पर उन पर तो कभी नही लगता UAPA इसलिए तो मैं बोल रहा हूँ कि इस कानून का ग़लत इस्तेमाल होता है ।
क्योंकि ज़्यादातर Accused के चार्जेज हटा दिए जाते हैं और उनको रिहा कर दिया जाता है ।
दरअसल इस एक्ट का काम ये नहीं कि पॉइंट और चार्ज को सिद्ध करना नही है, बल्कि सबक सिखाना है

अब बात करते हैं दूसरे कानून की जिसका नाम है “नेशनल सिक्योरिटी एक्ट” (NSA) राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जिसको ‘रासुका’ भी बोला जाता है । ये कानून सरकार को ये शक्ति देता है कि सरकार इस कानून के तहत किसी भी इंसान को डिटेन कर सकती है । जो सरकार को लगता है कि वो राष्ट्र के लिये खतरा है

सेंट्रल और स्टेट गवर्नमेंट दोनों ही इस कानून का इस्तेमाल करना कर सकती हैं इस कानून की नींव 200 साल पहले 1818 में रखी गयी थी उसके बाद इस क़ानून को तरह-तरह के नाम दिए गए हैं फिर देश आजाद हुआ नाम बदलते रहे कभी ये कानून चला गया कभी ये कानून वापिस आ गया और सालों तक यही चलता रहा

लेकिन 1980 ई में इंदिरा गाँधी ने जो तत्कालीन प्रधानमंत्री थीं उन्होंने इस कानून को नया सा नाम दिया और उसके साथ-साथ बहुत सारी शक्तियां दीं ये कानून पूरी तरह से बदल गया और इसको नाम दिया गया ‘NSA’ और तब ही से ऐसे चलते आ रहा है।

NSA अक्सर खबरों में आ जाता है अब चाहें वो ग़लत वजहों से ही क्यों न हम इसका एक उदाहरण आपको देते हैं, CAA-NRC के प्रोटेस्ट के दौरान डॉक्टर कफील खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक स्पीच दी उसके बाद उत्तरप्रदेश सरकार ने उनपर ही NSA लगा दिया और उनको जेल में डाल दिया तकरीबन 9 महीनों के लिए उसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट को आना पड़ा और यूपी पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि इन पर NSA ग़लत तरीक़े से लगा हुआ है इसको तुरन्त हटा दीजिये। उसके बाबजूद भी कोई माफी नहीं मांगी गई यहां तक के भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आज़ाद भी इस कानून के तहत 130 दिनों से ज़्यादा जेल में रहे हैं

NSA का सबसे बड़ा क्रिटिसिज्म ये है कि NCRB ‘National crime records bureau’ जो कि देश में हुए क्राइम का डेटा इकट्ठा करता है उसको एनालाइज़ करता है उसके पास ही NSA का कोई डेटा नहीं है कहने का अर्थ यह है कि NSA के तहत कितने लोग अंदर गए कितने लोग बाहर आए उसमें इंकलुड ही नहीं होता। लेकिन उत्तरप्रदेश में हमारे पास NSA का डेटा है यूपी में आधे से ज़्यादा जो NSA केसेस लगाए गए हैं वो गो-तस्करी से संबंधित हैं

अब हम आपको बताते हैं आखिरी और तीसरे चार्ज की तरफ जो कि इंडियन पीनल कोर्ट(IPC),124 “Sedition”

सन 1870 में अंग्रेजों द्वारा इस कानून को बनाया गया था वर्ष 1898 में मैकॉले दंड सहिंता के तहत देशद्रोह का मतलब था, ऐसा कोई व्यक्ति जिससे सरकार के खिलाफ असन्तोष ज़ाहिर हो” अगर आप देश में चुनी हुई सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलते हो, लिखते हो,यहां तक के इशारा कर दो, अगर आप जो बन्दा ऐसा कर रहा है मतलब की सरकार की आलोचना कर रहा है उसको सपोर्ट भी कर दो तो आप देशद्रोही करार कर दिए जाओगे

इंडियन पीनल कोड में सेडिशन को ऐड किया गया था 1870 में ‘वहाबी आंदोलन’ की रीढ़ की हड्डी तोड़ने के लिए, वहाबी आंदोलन को जड़ से खत्म करने के लिए बाद मैं ये एक्ट हमेशा के लिए अमर हो गया आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिसने ये कानून बनाया खुद ये अपने देश मे खत्म कर दिया है

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी इस कानून को महात्मा गांधी और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जैसे लीडर्स की आवाज़ को दवाने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया था और उनकी इसकी वजह से जेल भी जाना पड़ा था और आज़ादी के बाद बहुत सारे एक्टिविस्ट,ऑथर, क्रिएटिव प्रोफेशनल चाहें सरकार किसी की भी हो

 

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