ये वीडियो मैंने कई बार देखा. इसने मुझे थोड़ा भावुक किया. मैं उन हाथों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था जो थोड़ी देर पहले तक हंसिया पकड़े हुए होंगे. अब उन हाथों में रोटी-साग के निवाले हैं. सामने इंदिरा गांधी की पोती खड़ी हंस रही है. एक साथ कई-कई हाथ उन्हें रोटी खिलाना चाहते हैं. कई हाथ एक साथ बढ़ते हैं. कई हाथ गिलास थामकर पानी पिलाना चाहते हैं. प्रियंका गांधी जिस महिला के हाथ से खा रही हैं, वापस उसे भी खिला रही हैं. इन महिलाओं में आपस में होड़ लगी है. प्रियंका हंसते हुए कह रही हैं, कितना गुड़ खिलाओगी. मेरेे भाई ने कहा है कम खाओ, मोटी हो रही हो. कहकर हंसती हैं.

मुझे लगा जैसे मैं वहां मौजूद हूं. इन महिलाओं को देखकर हमारे गांवों की गर्मजोशी ताजा हो आई कि कोई बड़ा आदमी आ जाए तो कैसे हम सब उसे घेर लेते थे. मैं जब तक गांव में रहा, हमेंशा हाथ में घट्ठे पड़े रहते थे. ठंड शुरू होते अक्सर पोर फटे रहते थे. धान काटने वाले ये हाथ भी तो आजकल खुश्क होंगे. वे हाथ आज जवाहर की पड़पोती, इंदिरा की पोती और राजीव की बेटी के होटों तक पहुंच पा रहे हैं. वल्लाह! एक किसान के लिए यह क्षण बेहद खास है. यह कोई धन्य हो जाने जैसी बात नहीं है. यह इज्जत मिलने की बात है. यह किसी के अपने जैसा होने की बात है.

याद है एक बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कुशीनगर की एक दलित बस्ती में गए थे? उनके जाने से पहले उन दलितों को साबुन-शैंपू और सेंट दिया गया था और सख्त हिदायत दी गई थी कि वे सीएम के सामने बिल्कुल नहा-धोकर, सेंट लगाकर आएं.

मेरी कल्पना में नेता गांधी जैसा सरल सुलभ होना चाहिए जिसके पास कोई भी जाकर कह पाए कि घर में एक ही धोती है, हम सास बहू दोनों कैसे पहनें? नेता नेहरू जैसा सहज होना चाहिए जिसकी कॉलर पकड़कर कोई महिला पूछे कि देश की आजादी से मुझे क्या मिला, तो वह मुस्कुरा कर कह दे कि प्रधानमंत्री का कॉलर पकड़ने की आजादी. इतना सुलभ और सरल होने के खतरे भी हैं, जैसा महात्मा गांधी और राजीव गांधी के साथ हुआ, लेकिन जो खतरे से डर जाए, वह गांधी कैसा? अपने देश के लोगों के साथ रहो, उनके हाथ से खाओ, उन्हें अपने हाथ से खिलाओ. उनके साथ ठहाके लगाओ, उनके दुख बांटो, उनके लिए जो जरूरी है वह सब करो. फिर ये करोड़ों मेहनतकश आपके होंगे और जिसे रोटी खिलाने, पानी पिलाने के लिए करोड़ों देशवासियों के हाथ हों, उसे अगर कोई चिंता करनी है तो सिर्फ ये कि उन हाथों को कभी दर्द न हो.

जीत हार की चिंता किए बगैर ये राजनीति जारी रहनी चाहिए. नफरतों के दौर में इसकी बहुत जरूरत है.

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