दिल्ली में जानलेवा होता वायु प्रदूषण (Air Pollution) आम लोगों के लिए परेशानी का सबब बन चुका है। राजधानी दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) भी अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। इसी बीच बुधवार, 17 नवंबर को प्रदूषण को लेकर दायर याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश की मीडिया पर तल्ख टिप्पणी की और कहा कि, ‘टीवी चैनलों पर होनी वाली बहस दूसरी चीजों से अधिक प्रदूषण फैला रही हैं।”

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) एनवी रमना ने कहा कि सबकी अपनी कुछ जिम्मेदारी होनी चाहिए, अदालतों के आदेशों से ही सब कुछ नहीं किया जा सकता है।

टीवी चैनलों के डिबेट्स को आड़े हाथों लेते हुए CJI एनवी रमना ने कहा कि टेलीविजन चैनलों पर बहस किसी और की तुलना में ज्यादा प्रदूषण फैला रही हैं। उन्होंने कहा कि हर किसी का अपना एजेंडा होता है और इस तरह की बहसों के दौरान बयानों को संदर्भ से बाहर कर दिया जाता है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उसने जो देखा वो किसानों की दुर्दशा थी।

कोर्ट ने कहा, “दिल्ली में पांच या सात सितारा होटलों में बैठे लोग कहते हैं कि प्रदूषण बढ़ने में 30-40 प्रतिशत किसानों का योगदान है। क्या आपने उनकी कमाई देखी है? हम नजरअंदाज करते हैं कि पाबंदी के बावजूद दिल्ली में पटाखे जलाए जा रहे हैं।’

सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ते प्रदूषण के लिए किसानों पर लग रहे आरोप को लेकर कहा कि पांच और सात सितारा होटल के AC कमरे में बैठकर आरोप लगाना आसान है। दरअसल, दिल्ली सरकार की ओर से कोर्ट में पक्ष रख रहे अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पराली जलाना बढ़ते प्रदूषण का एक मुख्य कारण है। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि, “आपकी सरकार किसानों को मशीन मुहैया कराने में सक्षम हैं फिर किसानों को आखिर पराली जलानी क्यों पड़ती है।

“मामले की सुनवाई कर रहे सीजेआई एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि प्रत्येक का अपना एक एजेंडा होता है और इन बहसों में बयानों को संदर्भ से बाहर कर दिया जाता है। पीठ ने कहा कि आप किसी भी मूद्दे पर हमसे टिप्पणी कराना चाहते हैं और अपने एजेंडे के हिसाब से उसे विवादास्पद (Controversial) बनाते हैं।

टीवी चैनलों पर बयानों को तोड़ मरोड़कर पेश करने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि टीवी डिबेट्स इन दिनों किसी भी दूसरी चीज से कहीं अधिक प्रदूषण उत्पन्न हो रहा है। टीवी चैनलों को समझ में नहीं आता कि क्या हो रहा है और क्या मुद्दा है। बयानों का संदर्भ से बाहर इस्तेमाल किया जाता है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने टेलीविजन पर परिचर्चाओं का उल्लेख किया और कहा कि उन्होंने दावा किया कि उन्होंने (मेहता) वायु प्रदूषण में पराली जलाने के योगदान पर शीर्ष अदालत को गुमराह किया था।

मेहता ने कहा कि मैंने अपने खिलाफ टीवी मीडिया पर कुछ गैर-जिम्मेदार और अप्रिय बयान देखे कि मैंने यह दिखाकर पराली जलाने के सवाल पर अदालत को गुमराह किया कि इसका योगदान केवल 4 से 7 प्रतिशत है। मुझे स्पष्ट करने दीजिये।”

शीर्ष अदालत ने इसपर कहा कि, “हमें बिल्कुल भी गुमराह नहीं किया गया था। आपने 10 प्रतिशत कहा था लेकिन हलफनामे में यह बताया गया था कि यह 30 से 40 प्रतिशत है।” पीठ ने कहा कि इस प्रकार की आलोचना होती है जब हम सार्वजनिक पदों पर होते हैं। हम स्पष्ट हैं, हमारा विवेक स्पष्ट है, यह सब भूल जाइए। इस प्रकार की आलोचनाएं होती रहती हैं। हम केवल समाधान निकालने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

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